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कविता: चाय बनाम चरित्र

चाय और चरित्र,

दोनों बड़े विचित्र।

 

उठे तो प्रसिद्द्धि,

गिर जाए तो दाग,

एक शीतलता से बने।

एक को बनाए आग।।

 

दोनों में असमानता।

जिन्हें कोई नहीं जानता।।

 

एक को पीना,

दूसरे में जीना,

 मतलब..विरोधाभास है।

एक को बर्तन में,

दूसरे को जीवन में,

बस बात यही खास है।।

 

मिलने में बड़ा मतभेद।

चरित्र से मिले तो काला भी सफेद।।

 

अगर मिले काली चाय।

 तो अपना रंग भी जाए।।

 

 चाय से चंचलता।

चरित्र से निर्मलता।।

 

चाय गरम।

चरित्र में धर्म।।

 

एक बिकाऊ,

दूसरी टिकाऊ।

 इससे ज्यादा,

और क्या समझाऊं।।

 

कवि पंडित पुष्पराज धीमान भुलक्कड़, गांव नसीरपुर कलां हरिद्वार ,उत्तराखंड


 
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Author: Arun kumar Dixit

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