आखिर कौन निगल गया गाँवों के प्राकृतिक तालाब?
अतिक्रमण, प्रशासनिक चुप्पी और ग्रामीण राजनीति का सच
ग्रामीण भारत की पहचान रहे प्राकृतिक तालाब आज तेजी से इतिहास बनते जा रहे हैं। कभी ये तालाब पशु-पक्षियों, किसानों, चरवाहों और बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन आज इनकी जगह कंक्रीट, खेती या निजी कब्जों ने ले ली है।
तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि वर्षा जल संचयन, भू-जल संरक्षण और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करते थे। शादी-विवाह, कृषि कार्य, पशुपालन और दैनिक जीवन इन्हीं से जुड़ा था। मगर सवाल यह है कि ये तालाब अचानक कैसे गायब हो गए?
ग्रामीणों से बातचीत में सामने आता है कि तालाबों पर धीरे-धीरे अतिक्रमण किया गया। कहीं खेत बना दिए गए, कहीं मिट्टी भरकर रास्ते और भवन खड़े कर दिए गए। हैरानी की बात यह है कि सब कुछ सबकी आंखों के सामने हुआ, लेकिन न ग्राम पंचायत ने आवाज उठाई और न ही प्रशासन ने सख्ती दिखाई।
उत्तर प्रदेश के संभल जनपद के गवां-बरौरा मार्ग पर स्थित खजुवाही तालाब इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। कभी यह तालाब पूरे क्षेत्र की जल जरूरतें पूरी करता था, आज वहां केवल निशान भर बचे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि तालाब की भूमि पर धीरे-धीरे कब्जा होता चला गया।
इसी तरह बरौरा से बेल बाबा आश्रम मार्ग पर स्थित प्राचीन तालाब भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। वन विभाग द्वारा पेड़ लगाए जाने के बावजूद तालाब का क्षेत्रफल पहले की तुलना में काफी कम हो चुका है।
सवाल उठता है कि जब भूमि सुरक्षित थी, तो तालाब सिकुड़ा कैसे?
प्रशासनिक रिकॉर्ड में तालाब आज भी मौजूद हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यह स्पष्ट संकेत है कि या तो प्रशासनिक लापरवाही है या फिर जानबूझकर की गई अनदेखी।
अब सबसे बड़ा सवाल—
👉 क्या तालाब खत्म होने के लिए केवल प्रशासन जिम्मेदार है?
👉 या फिर वे ग्रामीण भी दोषी हैं, जिन्होंने चुप रहकर अतिक्रमण को बढ़ावा दिया?
यदि समय रहते इन प्राकृतिक जल स्रोतों को नहीं बचाया गया, तो आने वाले वर्षों में जल संकट और भी भयावह रूप ले सकता है।
हमारा काम है जनता को जागरूक करना।
इस खबर में बस इतना ही।
इसी तरह के सामाजिक मुद्दों को देखने के लिए जुड़े रहिए — ऑल मीडिया प्रेस एसोसिएशन से .
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