उत्तर प्रदेश में आस्था और विश्वास एवं मानवता के आधार पर बूढ़े बाबा की जात मेले का परंपरागत आयोजन होता है। प्रदेश के जनपद संभल में कस्बा गवाँ के पास सिरसा गांव में बूढ़े बाबा जात का आयोजन होता है । यह मेल प्रत्येक वर्ष माघ मास मैं शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को लगाया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यहां श्रद्धालु तालाब में मुंह धोते हैं एवं तालाब से मिट्टी निकालकर मिट्टी के छोटे-छोटे पिंड रखकर उन पर गेहूं व आटा एवं अन्य पूजन सामग्री चढाकर पूजा करते हैं । उसके बाद बूढ़े बाबा के मंदिर या थान पर पहुंचते हैं । वहां मंदिर का पुजारी भक्तों को भभूति अर्थात हवन की राख देता है । यहां पर श्रद्धालु अपने साथ में लाया हुआ गेहूं आटा जिसे सीधा बोलते हैं जिसमें आटे में मिर्च नमक गुड घी आदि साथ में लाते हैं वह सभी सामग्री बूढ़े बाबा के मंदिर या थान पर चढ़ा दी जाती है । यहां के बाद पास में ही मुर्गा का झाड़ा लगाया जाता है। जिसमें एक व्यक्ति सभी के सिर पर जिंदा मुर्गा रखता है। यह मानता है कि इस मुर्गा को सभी के सिर पर रखने मेला समापन के उपरांत उसकी बलि दी जाती है । मान्यता यह भी है कि मेले में मुंह जिठारना आवश्यक होता है । अर्थात वहां बैठकर या तो घर से लाया हुआ खाना या मेले से खरीदा हुआ खाना खाना होता है तभी जात की परंपरा पूर्ण होती है। लोगों का मानना है कि बूढ़े बाबा की जात लगाने से शरीर पर होने वाले चकोते दाग एवं अन्य चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के सनातन संस्कृति के लोगों में विवाह संस्कार के समय भी बूढ़े बाबा का पूजन की परंपरा है । जिसमें शादी वाले घर में अछूते नाम से एक आयोजन होता है इसमें कुम्हार को बुलाकर उससे बूढ़े बाबू का पूजन कराया जाता है। लोगों का मानना है कि भगवान भोलेनाथ का ही एक स्वरूप है बूढ़े बाबा इसलिए लोग बड़ी श्रद्धा और निष्ठा से बूढ़े बाबा की पूजा करते हैं।
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