केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 'संविधान की मूल संरचना' का ऐतिहासिक सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना (बुनियादी ढाँचे) को नहीं बदल सकती, जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और शक्तियों का पृथक्करण। यह फैसला संसद की संशोधन शक्ति की सीमा तय करता है और भारतीय संविधान की सर्वोच्चता व न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है, जिससे संविधान के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा होती है।
केशवानंद भारती केस (1973) की पृष्ठभूमि
- केरल सरकार ने भूमि सुधार कानून बनाए, जिससे मठों और ज़मींदारों की ज़मीनें अधिग्रहित की गईं।
- एडनीर मठ के प्रमुख केशवानंद भारती ने इन कानूनों को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
- संसद ने इन मामलों के जवाब में 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधन किए, जिससे न्यायपालिका की शक्ति सीमित हुई और संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन का अधिकार मिला।
मूल संरचना सिद्धांत की अवधारणा
- सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7-6 के बहुमत से फैसला सुनाया कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, पर संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती।
- यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि संसद संविधान को पूरी तरह बदल न दे और उसके मूलभूत सिद्धांतों को बरकरार रखे।
मूल संरचना के प्रमुख तत्व (उदाहरण)
- संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution)
- लोकतंत्र और गणतांत्रिक स्वरूप (Democracy and Republican form of Government)
- धर्मनिरपेक्षता (Secularism)
- शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary)
- संघवाद (Federalism)
महत्व
- यह मामला भारतीय संवैधानिक कानून का मील का पत्थर है।
- इसने संसद की संविधान संशोधन की शक्ति पर एक महत्वपूर्ण अंकुश लगाया।
- यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की अखंडता की रक्षा करता है।
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