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साहब किसान का दर्द समझिये
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साहब किसान का दर्द समझिये
साहब किसान का दर्द समझिये
ह बिल्कुल सही है, आज के समय में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में किसान इन दो मुख्य समस्याओं से भारी संकट में हैं। आपकी बात पूरी तरह जायज है।
यहाँ इन दोनों समस्याओं का किसानों पर जो असर पड़ रहा है, उसका विवरण दिया गया है:
1. छुट्टा पशुओं (Stray Animals) का आतंक
यह समस्या पिछले कुछ वर्षों में बहुत विकराल हो गई है
फसल की बर्बादी: किसान दिन-रात मेहनत करके फसल उगाते हैं, लेकिन छुट्टा गाय, सांड और नीलगाय रातों-रात पूरी फसल चर जाते हैं।गेंहू, सरसों और सब्जियों की खेती को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
रतजगा और स्वास्थ्य पर असर: कड़ाके की ठंड और कोहरे में भी किसानों को रात भर खेतों में मचान बनाकर पहरा देना पड़ रहा है।
इससे उनकी नींद और सेहत दोनों खराब हो रही है।
जान का खतरा: कई बार ये आवारा सांड और जानवर हमला कर देते हैं, जिससे किसानों की जान जाने या गंभीर रूप से घायल होने की खबरें आए दिन आती रहती हैं।
आर्थिक बोझ: खेतों को बचाने के लिए किसानों को अब बाड़ (fencing) लगाने पर हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं।
2. खाद विक्रेताओं (Fertilizer Sellers) की मनमानी
जब फसल बोने या पानी देने का समय आता है, तब खाद (खासकर यूरिया और डीएपी) की किल्लत खड़ी हो जाती है।
कालाबाजारी (Black Marketing): खाद की बोरी पर जो सरकारी दाम लिखा होता है, दुकानदार उससे कहीं ज्यादा (200-300 रुपये ऊपर) वसूलते हैं।मजबूरी में किसान को यह दाम चुकाना पड़ता है।
जबरन अन्य उत्पाद बेचना (Tagging): कई विक्रेता खाद की बोरी के साथ जबरदस्ती कीटनाशक, जिंक या नैनो यूरिया की बोतल थमा देते हैं, जिसकी किसान को उस वक्त जरूरत नहीं होती। इसे न खरीदने पर वे खाद देने से मना कर देते हैं।
लंबी कतारें: खाद केंद्रों पर सुबह 4 बजे से लाइनें लगती हैं।कई बार घंटों इंतज़ार के बाद भी खाद खत्म होने का बोर्ड लगा दिया जाता है या पुलिस की लाठियां खानी पड़ती हैं।
निष्कर्ष:
किसान इन दोनों समस्याओं के बीच पिस रहा है। एक तरफ आवारा पशु फसल उगने नहीं देते, और दूसरी तरफ खाद विक्रेता फसल को पोषण मिलने नहीं देते।[। सरकार ने गौशाला में बनना और खाद की ऑनलाइन मॉनिटरिंग के दावे तो किए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि किसान आज भी अपनी फसल और अपनी जे
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